इस्राईल के चैनल-13 ने अपनी एक डाक्यूमेंट्री में सन 1997 में फिलिस्तीनी संगठन हमास के पूर्व राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख खालिद मशाल की हत्या की कोशिश और जार्डन के दिंवगत नरेश शाह हुसैन की प्रतिक्रिया के बारे में विस्तार से बताया है। यह डाक्यूमेंट्री, अरब नेताओं और वेशष कर उन लोगों के लिए जो इस्राईल पर भरोसा करते हैं एक पाठ है।
हमास के वरिष्ठ नेता खालिद मशाल की हत्या की कोशिश जार्डन की राजधानी अम्मान में की गयी थी और इस हत्या का आदेश स्वंय बेन्यामिन नेतेन्याहू ने दिया था। नेतेन्याहू ने यह फैसला इस लिए किया था क्योंकि हमास के सदस्यों ने यरुश्लम और तेलअबीव के केन्द्र में घुस कर आत्मघाती हमले किये थे जिससे इस्राईल की पूरी सरकार हिल गयी थी। इन हमलों में 200 से अधिक लोग हताहत और घायल हुए थे। इस से नेतेन्याहू की कुर्सी हिल गयी थी और उनका दबदबा खतरे में पड़ गया था यही वजह थी कि नेतेन्याहू ने हमास के किसी " बड़े " नेता की हत्या का फैसला किया मगर इस फैसला का असर उल्टा पड़ा।
हत्या के लिए मोसाद के एक्सपर्ट एजेन्ट कनाडा के पास्पोर्ट से जार्डन में घुसे और उनके साथ एक डॉक्टर भी था जिसके पास ऐसा खास किस्म का ज़हर था जो शरीर में इंजेक्ट किये जाने के 4 घंटों के भीतर शिकार की जान ले लेता था, मगर खालिद मशाल के बॉडी गार्ड्स ने जान पर खेल कर इस्राईल की योजना पर पानी फेर दिया। उन्होंने मोसाद के दो एजेन्टों को दबोच लिया और चार एजेन्ट भाग कर इस्राईली दूतावास में घुस गये, मगर ज़हर का कुछ भाग, खालिद मशाल के शरीर में इंजेक्ट किया जा चुका था।
इसके बाद जार्डन नरेश, शाह हुसैन की भूमिका शुरु हुई, उन्हें जैसे ही पता चला कि इस्राईल ने उनके देश में साज़िश रच कर हमास के नेता की हत्या की कोशिश की है, उन्होंने धमकी दी कि इस्राईल के साथ " अरबा घाटी" का समझौता खत्म कर देंगे, हत्या की कोशिश में लिप्त सभी लोगों को मौत की सज़ा देंगे और अम्मान में इस्राईली दूतावास बंद कर देंगे। उन्होंने यह सब करने का पक्का इरादा कर लिया था और इस्राईल को भी पता चल गया था कि वह यह सब कुछ कर देंगे यही वजह है कि नेतेन्याहू मामला संभालने के लिए मैदान में उतरे और उन्होंने ज़हर भरी सुई बनाने वाले विशेषज्ञ को उसके " तोड़" के साथ एक विशेष विमान से, फौरन जार्डन भेजा जहां अस्पताल में खालिद मशाल जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। अस्पताल पहुंच पर इस्राईल डॉक्टर ने उस इस्राईली ज़हर की दवा उन्हें इंजेक्ट और उनकी जान बच गयी। यही नहीं नेतेन्याहू को मोसाद के पकड़े गये दो एजेन्टों को बचाने के लिए हमास के संस्थापक और नेता " शेख अहमद यासीन मलिक" को जेल से रिहा करना पड़ा।
यह घटना मोसाद के लिए कलंक का टीका बन गयी और बुरी तरह से नाकाम रही। बाद में मोसाद और इस्राईल के अधिकारियों ने पछताते हुए इस अभियान की नाकामी के कारणों पर खूब चर्चा की। यह पूरी घटना अरब नेताओं के लिए एक पाठ है जो आज कल इस्राईल के साथ बैठकों का आयोजन कर रहे हैं। इन अरब नेताओं को जान लेना चाहिए कि इस्राईल केवल ताक़त की ज़बान समझता है बस।
हमारी इच्छा है कि जार्डन इसी प्रकार के मार्ग पर अब भी चले। जार्डन के राजदूत की तेलअबीव से वापसी और जार्डन के दो नागरिकों की रिहाई से पहले वापस न जाना, जार्डन नरेश द्वारा, " बाक़ूरा " और " अलग़मर" इलाक़ों की " लीज़" को न बढ़ाना और नेतेन्याहू से किसी भी प्रकार की मुलाक़ात से इन्कार वह चिन्ह हैं जिनसे पता चलता है कि वह भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने का संकल्प कर रहे हैं। हम आशा करते हैं कि वह इस्राईल के साथ गैस समझौते को भी खत्म करेंगे क्योंकि यह बड़े शर्म की बात है कि जार्डन के लोग, इस्राईल से वह गैस खरीदें जो वह फिलिस्तीनियों से चोरी करके लेता हो।